October 26, 2021
जल जंगल ज़मीन

चमोली में ग्लेशियर फटने का ज़िम्मेदार कौन है ? जानिए

Uttarakhand : उत्तराखंड के चमोली में ग्लेशियर फटने की वजह से जो तबाही मची उसने केदारनाथ वाली त्रासदी की यादें ताज़ा कर दीं। उत्तराखंड के ज्यादातर इलाके संवेदनशील माने जाते हैं और यहाँ अक्सर होने वाली त्रासदियों को प्राकृतिक किएहा टोल जाता है मगर काफी लोग ये बात समझ नहीं पाते की इन् साड़ी घटनाओं की वजह हम खुद (यानी) इंसान ही हैं। पर्यावरण को FOR GRANTED लेने की हमारी आदत सी पड़ गई है। अब अगर हम पर्यावरण के साथ लगातार मज़ाक करते रहे गए तो सामने से कभी नाक कभी तो जवाब  मिलेगा ही ना। कई एक्सपर्ट्स द्वारा चमोली में मची तबाही का ज़िम्मेदार उत्तराखंड में विकास की अंधी दौड़ को ठहराया जा रहा है। 

चारों तरफ हिमालय की पहाड़ियों से घिरे उत्तराखंड में कई डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं। इन प्रोजेक्ट्स को लेकर इससे पहले भी विवाद खड़े हो चुके हैं। पहले भी एक्टिविस्ट ने इन प्रोजेक्ट्स को पहाड़ के इकोसिस्टम के हिसाब से गलत बताया था। 

आइये चर्चा करते हैं उन् चार परियोजनाओं के बारे में जिनको हाल ही में चमोली में आयी त्रासदी का ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है। 

नैशनल हाईवे : उत्तखण्ड में सरकार नैशनल हाइवे का निर्माड़ कर वराही है ताकि चार धाम की यात्रा पर आये लोगों की यात्रा और सुगम हो सके। ये नैशनल हाईवे  केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री को आपस में जोड़ेगा। अब टूरिज़्म की दृष्टि से देखा जाए तो ये प्रोजेक्ट महत्वकांशी हो सकता है मगर इस सड़क की चौढ़ाई को लेकर विवाद सुप्रीम कोर्ट में जारी है। 800 से ज्यादा किमी लंबे इस स्ट्रेच में 365 किमी सड़क का निर्माण 10 मीटर की चौड़ाई के साथ किया गया है। इस प्रोजेक्ट का संचालन कर रहे सड़क मंत्रालय ने 2018 के अपने सर्कुलर कला ही पालन नहीं किया जिसमे कहा गया था की सड़क की चौढ़ाई  5.5 km से ज़्यादा नहीं होगी। 

डैम का निर्माण : उत्तराखंड की इन् प्राकृतिक त्रासदियों का ज़िम्मेदार डैम (बांध) के निर्माण को बताया जा रहा है। चमोली में आयी बाढ़ ने ऋषिगंगा में बन रहे हाइड्रो प्रोजेक्ट पूरी तरह नष्ट कर दिया।  तपोनव विष्णुगढ़ प्रोजेक्ट, विष्णुप्रयाग प्रोजेक्ट और पीपल कोठी प्रोजेक्ट को भी इससे नुकसान पहुंचा है। केदारनाथ बाढ़ के बाद सुप्रीम कोर्ट ने एक बांध के सन्दर्भ में एक कमेटी गठित की जिसने सिफारिश में कहा की उत्तराखंड में अब और बांधों का निर्माण नहीं होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने २०१३ में इस प्रोजेक्ट पर रोक तक लगा दी मगर फिर भी निर्माण जारी है। 

शिवालिक एलिफेंट रिजर्व : देहरादून के जॉलीग्रांट एयरपोर्ट को बढ़ाने के लिए उत्तराखंड सरकार ने नवंबर 2020 में शिवालिक एलिफेंट रिजर्व की अधिसूचना रद्द कर दी थी। वहीं, देहरादून एयरपोर्ट को बढ़ाने के लिए 10,000 पेड़ों के काटे जाने की भी तैयारी है। उत्तराखंड को विकसित बनाने के लिए सरकार इस प्रदेश केन पूरे इकोसिस्टम को हिला रही है। ये रिजर्व करीब 5 हजार किमी में फैला है. सरकार के आदेश के बाद कई पर्यावरणविद और स्थानीय लोगों ने इसका विरोध भी किया था। कई वकीलों ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से भी इस मामले में हस्तक्षेप करने की अपील की थी, जिसके बाद हाईकोर्ट ने जनवरी 2021 में सरकार के अधिसूचना रद्द करने के आदेश पर रोक लगा दी है।

खतरे को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है : उत्तराखंड में जो गंगोत्री ग्लेशियर है उससे भागीरथी नदी निकलती है।  कई बार ऊफान आ चूका है। 2017 में गंगोत्री गल्सिएर के पास नील ताल टूटने की वजह से भागीरथी में भारी उफान आया था और इस उफान का मलबा अभी तक गोमुख क्षेत्र में फैला हुआ है। उस मलबे को लेकर शासन की ओर से गठित निगरानी दल ने कई बार निरीक्षण भी कर दिया है। जबकि 2012 में डोडीताल का एक हिस्सा टूटने और ताल में मलबा भरने से असी गंगा घाटी में भारी नुकसान हुआ था।

उत्तराखंड में ‘विकास कार्य’ को लेकर ये विवाद बताते हैं कि कैसे संवेदनशील इलाके में निर्माण कार्य के दौरान नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, जिसका खामियाजा वहां के स्थानीय लोगों को भुगतना पड़ रहा है।  


 

Story Origin : उत्तराखंड

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