November 30, 2021
जल जंगल ज़मीन

टूटने से बचा किसानों का आंदोलन और उग्र , आर पार की लड़ाई


दिल्ली। किसानों का का देशव्यापी आंदोलन जहाँ 8  दिसंबर की शाम को टूटता  नज़र आया , 9 दिसंबर की शाम होते होते न केवल फिरसे एकजुट होगया बल्कि और उग्र और शक्स्तिशाली होकर उभरा है।  किसान नेताओं  ने सरकार की ओर  से आये लिखित प्रस्ताव को एक सुर में ठुकरा दिया और  देश भर में  आर पार की लड़ाई का एलान कर दिया, और यह  भी कहा की भारतीय जनता  पार्टी के नेताओं , विधायक और मंत्रियों का देश भर  में किसान घेराव करेंगे।  संयुक्त किसान मोर्चे ने 9 दिसंबर की शाम को एक प्रेस वार्ता करके बताया की 12 तारीख से वो जयपुर दिल्ली हाईवे जाम  कर देंगे और अगर उनके मांगे नहीं मानी गयीं तो वो पूरे देश का चक्का जाम करदेंगे।  14 दिसंबर से जिला मुख्यालय और जिला अधिकारीयों के दफ्तरों के घेराव का भी कौल दिया गया है। 12 तरीख को देश भर के टोल फ्री रहेंगे और आगे भी टोल न चलने देने के इरादे किसानों ने स्पष्ट कर  दिए हैं। किसानों ने जियो नेटवर्क और रिलायंस पेट्रोल पम्प के बहिष्कार की भी घोषणा की है।

 इस बीच 20 से अधिक विपक्षी दलों की रेहनुमायी लेकर राहुल गाँधी , शरद पवार , डी राजा और सीताराम येचुरी आदि राष्ट्रपति से मिलने पहुंचे।  कोविड प्रोटोकॉल के चलते सिर्फ विपक्ष के पांच बड़े नेताओं को ही राष्ट्रपति से मिलने की अनुमति मिली।  विपक्ष के नेताओं इन नेताओं ने भी किसानों के सुर में सुर मिलते हुए सरकार की कड़ी निंदा की। विपक्ष के इन नेताओं का यह साफ़ कहना था की सेलेक्ट कमेटी के सामने यह बिल लाया जाये और चर्चा भी हो।  बिना सेलेक्ट कमेटी के सामने लाये यह  कानून किसानों पर थोपना असंवैधानिक है। 

शाम होते होते कहानी में आ गया था नया ''TWIST''
किसान संगठनों से सरकार की अगली  बैठक 9  दिसंबर को तय थी लेकिन देर शाम एकदम से गृह मंत्री अमित शाह की एंट्री होती है। 
शाम 7  बजे अमित शाह ने 13  किसान नेताओं को बातचीत के लिए बुलाया जिसमें  राकेश टिकैत, गुरनाम सिंह चढूनी,हनन मुला,शिव कुमार कक्का जी ,बलवीर सिंह राजेवाल,रुलदू सिंह मानसा,मंजीत सिंह राय,बूटा सिंह बुर्जगिल,दर्शन पाल,कुलवंत सिंह संधू,बोध सिंह मानसा,जगजीत सिंह धल्लेवाल शामिल थे। बैठक से सबसे पहले राकेश टिकैत निकले , और उन्हें देखते ही मीडिया ने उन्हें पकड़ लिया।  आमतौर पर MEDIA FRIENDLY माने जाने वाले राकेश टिकैत मीडिया को देखते ही असहज हो गए। बैठक के बारे में जब मीडिया ने राकेश टिकैत से सवाल किये तो वो लगभग झेपते हुए कुछ भी कहने  को तैयार नहीं हुए।  यह तक की उन्होंने यह भी नहीं बताया  की उनकी अमित शाह से मुलाकात हुई भी की नहीं।  गोल मोल जवाब देते हुए वो मीडिया से कन्नी काटते नज़र आये।  ऐसे में यह सवाल उठा की क्या राकेश टिकैत के जरिये किसान आंदोलन खत्म कराने की तैयारी सरकार कर चुकी है।क्योंकि  राकेश टिकैत के कई दिनों से तेवर बदले हुए  नज़र आ रहे हैं।

  5 दिसंबर को जब किसानों ने कृषि मंत्री के साथ  बैठक  में सत्याग्रह के  सख्त तेवर दिखते हुए   yes or no के पर्चे थामे तब भी राकेश टिकैत ने बाहर आकर मीडिया से यही कहा की बातचीत बहुत अच्छी  हुई जबकि बाकी किसान नेताओं ने बताया था की कोई बातचीत ही नहीं हुई। 8 दिसंबर की सुबह भी जहां  बाकी नेताओं  ने आर पार के तेवर दिखाए , राकेश टिकैत ने मीडिया से  यही कहा की बातचीत से हल निकलेगा। राकेश टिकैत के इस PRO GOVERNMENT स्टैंड ने किसान आंदोलन का संतुलन बिगाड़ा है।  
सबसे बड़ा सवाल यह है की अगर सरकार से मिलने का दिन तय था , तो अमित शाह के बुलावे पर जाना एक दिन पहले जाना क्या स्थापित करता है। 

अमित शाह का मास्टर स्ट्रोक ATTEMPT 

  • अमित शाह ने किसानों को तीन समूहों  में बाँट दिया था ,और वो सबसे अलग अलग मिले।  
  •  अमित शाह ने तय बैठक से सिर्फ एक दिन पहले अचानक यह मीटिंग करके किसानों के कुनबे में अस्थिरता लाने की कोशिश की। 
  • राकेश टिकैत का  हक्का बक्का होना भी आंदोलन की मजबूती पर कई सवाल खड़े कर  रहा था , जिसको अमित शाह का असर भी कहा जा सकता है  .​​​​​​​

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भारतीय किसान यूनियन (उगराहां) के नेता जोगिंदर सिंह उगराहां ने वीडियो बयान जारी कर कहा कि कुछ नेताओं को अकेले बैठक में नहीं जाना चाहिए था, इससे किसान संगठनों की एकता को लेकर शंकाएँ खड़ी हो सकती हैं.

जोगिंदर सिंह उगराहां इस बातचीत के लिए नहीं गए क्योंकि पंजाब के सबसे बड़े किसान संगठन भारतीय किसान यूनियन (उगराहां) के इस नेता को बातचीत के लिए निमंत्रित नहीं किया गया.

जोगिन्दर सिंह उगराहां के इस बयान से किसान आंदोलन में फूट  की खबर ने तूल  पकड़ लिया। 9 दिसंबर की बैठक स्थगित कर दी गयी और सरकार ने किसानों के पास एक लिखित प्रस्ताव भेजना का फैसला किया। सरकार ने यह भी कहा की  किसान संगठन प्रस्ताव पर चर्चा और बैठक करके कुछ सकारात्मक फैसला लें। 

 

अमित शाह का MASTERSTROKE FAIL , किसानों ने सरकार का लिखित प्रस्ताव ठुकराया

लेकिन अंत भला तो सब भला...
टिकैत के नर्म   तेवर और सरकार की अलग अलग मिलने की रणनीति ने किसानों के बीच 8 दिसंबर की देर शाम को खलबली मचा   दी। सिंघु बॉर्डर पर धरना दे रहे किसान नेताओं ने इससे सरकार की चाल बताया।  उन्होंने कहा ''सरकार इस आंदोलन को सिर्फ पंजाब  और हरयाणा का आंदोलन बनाना चाहती है लेकिन हम ऐसा नहीं होने देंगे ''  ''दक्षिण के किसानों को सरकार दिल्ली नहीं आने दे रही '' 
9 दिसंबर को लगभग दोपहर 12 बजे सरकार ने किसानों को कैबिनेट की  बैठक  के बाद   लिखित प्रस्ताव भेजा गया है, जिसमें मुख्य रूप से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का जिक्र किया गया है. इसके अलावा सरकार की ओर से प्रस्ताव में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग, मंडी सिस्टम में किसानों की सहूलियत देने और प्राइवेट प्लेयर्स पर टैक्स लगाने की बात की गई है।  इसके साथ ही सरकार ने किसानों को छठे दौर की बातचीत के लिए निमंत्रण दिया है।  किसान और सरकार के बीच छठे दौर की बातचीत  11 दिसंबर सुबह 11  बजे विज्ञान भवन में हो सकती है। 
लेकिन दोपहर होते होते  यह खबर आने लगी सरकार की सरकार के  दिए इन प्रस्तावों को किसानों ने फिर  एक  बार सिरे से नकार दिया है , और वो अभी भी अपनी पुरानी  मांग पर अड़े हैं जिसमें  उन्होंने यह साफ़ कर दिया था की  तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने के अलावा उन्हें कोई और रास्ता मंज़ूर नहीं है।  
ऐसे में जहाँ 8  दिसंबर की शाम को किसानों का  यह आंदोलन बिखरता दिख रहा था , अब कहा जा सकता है की फिरसे ट्रैक पर आ गया है और अंत भला तो सब भला।    

राहुल गाँधी की किसानों से भावुक  अपील ,''कहा आप हिन्दुस्तान हैं। '' 

राष्‍ट्रपति से मुलाकात के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि किसानों ने देश की नींव रखी है. वो रात-दिन मेहनत करते हैं. केंद्र सरकार द्वारा लाया गया कृषि कानून उनके हित में नहीं है. इन बिलों को संसद में बिना चर्चा के असंवैधानिक तौर पर पास कराया गया है. उन्‍होंने कहा कि जिस तरह से कृषि विधेयक पारित किए गए, हमें लगता है कि यह किसानों का अपमान है. इसलिए वे ठंड के मौसम में भी प्रदर्शन कर रहे हैं. सारे विपक्षी दाल उनके साथ है , दुनिया में कोई ताकत नहीं है जो किसानो को पीछे धकेल दे।  लेकिन अभी नहीं तो कभी नहीं। राहुल गांधी ने कहा की मोदीजी और उनके कॉर्पोरेट दोस्त भारत की कृषि को भी हड़पने की साज़िश रच रहे हैं।  राहुल ने किसानों से कहा की पूरा विपक्ष आपके साथ है।  आप हिन्दुस्तान हैं। 

शरद पवार ने कहा कि कृषि बिलों की गहन चर्चा के लिए सभी विपक्षी दलों ने एक अनुरोध किया था और कहा था कि इसे सलेक्‍ट कमेटी के पास भेजा जाए. लेकिन दुर्भाग्‍य से इस सुझाव को स्‍वीकार नहीं किया गया और बिलों को जल्‍दबाजी में पारित कर दिया गया. शरद पवार ने कहा कि इस ठंड में किसान अपनी नाराजगी जताते हुए शांतिपूर्ण तरीके से सड़कों पर उतर रहे हैं. इस मुद्दे को हल करना सरकार का कर्तव्य है.

सीताराम येचुरी ने कहा कि हमने राष्ट्रपति को ज्ञापन दिया है. हम कृषि कानूनों और बिजली संशोधन बिल को रद्द करने के लिए कह रहे हैं, जिसे बिना लोकतांत्रिक तरीके से पारित किया गया. 25 से अधिक विपक्षी दलों ने कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग के प्रति अपना समर्थन दिया है. ये कानून भारत के हित में नहीं हैं और इससे हमारी खाद्य सुरक्षा को भी खतरा है.
 

Story Origin : दिल्ली

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